भक्ति करने से भौतिक कष्टो से तत्काल रहत!!!! कौन नही चाहेगा?

सेवा का वर्णन श्रील रूप गोस्वामी द्वारा विभिन्न शास्त्रों के प्रमाणों के साथ किया गया है। उनका कहना है कि शुद्ध भक्ति सेवा  के छह लक्षण हैं, जो इस प्रकार हैं:

(1) शुद्ध भक्ति से सभी प्रकार के भौतिक कष्टों से तत्काल राहत मिलती है।

(२) शुद्ध भक्ति सेवा सभी शुभता की शुरुआत है।

(३) शुद्ध भक्ति सेवा स्वतः ही दिव्य आनंद में डाल देती है।

(४) शुद्ध भक्ति सेवा विरले को ही प्राप्त होती है।

(5) शुद्ध भक्ति करने वाले लोग मुक्ति की भी इच्छा नहीं करते हैं।

(६) शुद्ध भक्ति सेवा ही कृष्ण को आकर्षित करने का एकमात्र साधन है।

जब मैं  इस्कान के संपर्क में  आई तो मुझे पता चला कि जो जीवन मैं तब तक जी रही थी उसे भौतिक जीवन कहते है और फिर मुझे अध्यात्मिक जीवन के बारे में  पता चला।फिर उपरोक्त पॉइंट्स जब पहली बार मैंने पढ़े थे तब पॉइंट (1) ने विशेष रूप से मेरा ध्यान आकर्षित किया। भक्ति करने से भौतिक कष्टो से तत्काल रहत!!!! कौन नही चाहेगा?

हम आध्यात्मिक लक्ष्य के साथ कृष्णभावनामृत में आते हैं। हम में से अधिकांश भी अपने सभी भौतिक संकटों और चिंताओं के लिए फूल-प्रूफ समाधान ढूंढ रहे हैं और एक प्रकार से हमारी भौतिक समस्याओं के लिए कृष्ण की ओर मुड़ना सही ही है क्योंकि कृष्ण ही हमारे एकमात्र रक्षक और आश्रय हैं।

संताप (डिस्ट्रेस) का कारण क्या है ?

उत्तर-संकट,अत्यधिक चिंता, दुःख या दर्द।

स।माधान के तीन स्तर यह प्रस्तुत किये गए है-

1)उत्तम समाधान –

कृष्ण हमें परेशान हुए बिना संकट को सहन करने की सलाह देते हैं भगवद गीता(2.14)

‘हे कुन्तीपुत्र, सुख-दुःख का अस्थाई रूप और समय के साथ उनका गायब होना, सर्दी और गर्मी के मौसमों के प्रकट होने और गायब होने के समान हैं। वे इंद्रिय बोध से उत्पन्न होते हैं, हे भरत के वंशज, और किसी को परेशान किए बिना उन्हें सहन करना सीखना चाहिए।”

कहा से आसान लगता है यह?यहां तक ​​​​कि अच्छी तरह से कृष्ण भावनामृत में  स्थापित भक्त भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं और परेशान हो जाते हैं जब उन पर संकट आता है। मैं ही क्यों? अब क्यों?  कैसे हल कर सकती हूं इस समस्या को? मैं दूसरों की मदद कैसे कर सकती हूं जो इससे गुजर रहे हैं?

हम संकट कई पहलुओं से देख सकते हैं।

तो उत्तम समाधान है – दार्शनिक समझ।

कर्म दो प्रकार के होते हैं, पवित्र और अपवित्र। पवित्र गतिविधियों को करने से व्यक्ति उच्च भौतिक भोग के लिए सुविधाएं प्राप्त होती है, लेकिन अपवित्र गतिविधियों के कारण हमे गंभीर संकट से गुजरना पड़ता है। हालांकि, एक भक्त को सुख भोग में कोई दिलचस्पी नहीं है या संकट से वह प्रभावित नहीं है। जब वह समृद्ध होता है तो वह जानता है, ” मैं अपने पवित्र कार्यों के परिणामों को कम कर रहा हूं, ” और जब वह संकट में होता है तो वह जानता है, ” मैं अपने पापों की प्रतिक्रियाओं को कम कर रहा हूं ।”0 एक भक्त को भोग या संकट से कोई सरोकार नहीं है; वह केवल भक्ति सेवा करना चाहता है। श्रीमद्भागवतम् में कहा गया है कि भक्ति सेवा अप्रतिहत होनी चाहिए, सुख या संकट की भौतिक स्थितियों से प्रभावित हुए बगैर।(श्रीमद्भागवत 4.12.13)

लेकिन दार्शनिक समझ के साथ संकट का सामना करने से बेहतर है कि हम अपनी व्यथित स्थिति को सीधे कृष्ण से जोड़ सकें।

तो 2) अति उत्तम (बेहतर) समाधान है: कृष्ण को याद करने की प्रेरणा

हरि शब्द विभिन्न अर्थों को व्यक्त करता है, लेकिन शब्द का मुख्य महत्व यह है कि वह (भगवान) सभी अशुभ को जीतते हैं और शुद्ध पारलौकिक प्रेम देकर भक्त के मन को दूर कर लेते हैं। घोर संकट में प्रभु का स्मरण करने से मनुष्य सभी प्रकार के दुखों और चिंताओं से मुक्त हो सकता है । धीरे-धीरे भगवान एक शुद्ध भक्त की भक्ति सेवा के मार्ग में सभी बाधाओं को दूर कर देते हैं, और नवधा भक्ति की गतिविधियों, जैसे श्रवण, कीर्तन और जप का परिणाम प्रकट होता है।

3)सर्वोत्तम (सर्वोत्तम) समाधान: कृष्ण मुझे कड़वे अनुभव देकर ठीक कर रहे हैं।

तथ्य यह है कि सभी रूपो में, सब कुछ कृष्ण ही है। एकं वादवित्यं ब्रह्म । कोई दूसरा अस्तित्व नहीं है ।

जो वास्तव में शुद्ध भक्त है , विद्वान हैं पूर्ण रूप से समर्पित है, वे जीवन की किसी भी स्थिति में भगवान के परम व्यक्तित्व को समझने और देखने के मंच पर पहुंच गए हैं । प्रेमांजन-चचुरिता-भक्ति-विलोकनेन संतम सदाैव हृदयेशु विलोकायंती (भगवद्गीता 5.38)। विद्वान भक्त संकट की स्थितियों को भी भगवान की उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करने के रूप में स्वीकार करते हैं। जब कोई भक्त संकट में होता है, तो वह देखता है कि भगवान भक्त को भौतिक संसार के प्रदूषण से मुक्त करने या शुद्ध करने के लिए संकट के रूप में प्रकट हुए हैं । हम आत्मा है  इस भौतिक दुनिया के भीतर है,शरीर मे है, विभिन्न स्थितियों में है, और इसलिए सर्वोत्तम भक्त संकट की स्थिति को भगवान की एक और विशेषता के रूप में देखता है ।त ते ‘नुकमपां सु-समीक्षामाओ (श्रीमद्भागवत 10.14.8 में प्रभुपाद कहते है-“भगवान का ऐसा प्रामाणिक सेवक, सभी कष्टों को भगवान की व्यक्तिगत संगति प्राप्त करने के लिए एक छोटी सी कीमत चुकाने के लिए, निश्चित रूप से भगवान का एक वैध पुत्र बन जाता है, जैसा कि यहां दया-भाक शब्दों से संकेत मिलता है । जिस प्रकार कोई अग्नि बने बिना सूर्य तक नहीं पहुंच सकता, उसी प्रकार कठोर शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजरे बिना परम शुद्ध भगवान कृष्ण के पास नहीं जा सकते, जो दुख की तरह लग सकता है, लेकिन जो वास्तव में भगवान के व्यक्तिगत हाथ द्वारा प्रशासित एक उपचारात्मक उपचार है।”

इसलिए भक्त, संकट को भगवान का एक बड़ा उपकार मानता है क्योंकि वह समझता है कि उसे दूषित किया जा रहा है । तेशम अहं समुद्रतत्त्व मृत्यु-संसार-सागरत ( भगवदगीता 12.7)। संकट की उपस्थिति एक नकारात्मक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य भक्त को इस भौतिक दुनिया के आकर्षण से राहत देना है  जिससे मृत्यु-संसार , या जन्म और मृत्यु की निरंतर पुनरावृत्ति के चक्र से निकल सके ।

एक समर्पित आत्मा को बार-बार जन्म और मृत्यु से बचाने के लिए, वह उसे कष्ट देकर दूषित होने से शुद्ध करता है । यह एक अभक्त द्वारा नहीं समझा जा सकता है, लेकिन एक भक्त इसे देख सकता है क्योंकि उसको ज्ञान रूपी चक्षु मिल गए है। एक अभक्त, इसलिए, संकट में परेशान है, लेकिन एक भक्त भगवान की एक और विशेषता के रूप में संकट का सामना करता है । सर्वं खल्व इदं ब्रह्म । एक भक्त वास्तव में देख सकता है कि सबकुछ परम भगवान कृष्ण का सर्वोच्च व्यक्तित्व है और कोई दूसरी इकाई नहीं है। एकं वादवित्यम । केवल भगवान ही हैं, जो स्वयं को विभिन्न ऊर्जाओं में प्रस्तुत करते हैं।

कौन हैं ऐसे भक्त?

वे भक्त जो उचित आश्रय में हैं, जिनकी चेतना विकसित हुई है और जो कृष्णभावनामृत में आगे बढ़ने के लिए दृढ़ संकल्पित और उत्साही हैं। ऐसे भक्त सभी संकटों को केवल श्री गुरु और गौरांग की कृपा के रूप में देखते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि कृष्ण जानते हैं कि उनकी आध्यात्मिक प्रगति के लिए सबसे अच्छा क्या है और जो कुछ भी हो रहा है वह कृष्ण की मेरे लिए जो योजना है उसके अनुसार ही है।

क्या मैं अपनी चेतना को इस तरह संरेखित कर सकती हूँ?

यह स्पष्ट रूप से एक बहुत ही उच्च और विकसित चेतना है, लेकिन इसके लिए भक्त को विश्वास होना चाहिये कृष्ण पर, इसे ही कहते है आत्मनिवेदन करना, खुद को अर्पित कर देना , पूर्ण शरणागति।बलि महाराज का समर्पण याद करिये, शुक्राचार्य के द्वारा आगाह किये जाने के बावजूत (की वामन देव भगवान विष्णु है जो तुमसे सब कुछ छीन लेना चाहते है जान गए थे तो भी,) बलि महराज अपना सब कुछ अर्पित कर देते है और भगवान को प्रसन्न कर लेते है।

तो भक्ति के लिए सरलता चाहिए, भगवान सब के हितैषी है, तो चाहे मेरे साथ बुरा हो रहा है पर यही मेरे लिए अच्छा है यह विश्वास होना चाहिए।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण

कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हरे राम हरे राम

राम राम हरे हरे

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