चुनौतिया और हम

जीवन की चुनौतियों से कैसे निपटा जाये ? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए एक शिक्षक ने अपने छात्र से एक गिलास , उबलता पानी , एक आलू , थोड़ी सी रुई और जड़ी बूटिया लाने  के लिए कहा l शिक्षक ने पहले आलू को उबलते पानी में डाला तो कुछ ही मिनटों में वह आलू पक गया   l “   चुनौतियों  आने पर कुछ लोग भावनाओ में डूबकर टूट जाते है – ऐसा मत बनाना , “ शिक्षक ने कहा l तब उन्होंने रुई को उफनते पानी में डाला l कुछ ही क्षणों में वह खिली खिली रुई कठोर और अछेद बन गई – “ कुछ लोग कठोर और दूसरो के प्रति बेरव।ह बन जाते है – ऐसा भी मंत बनाना , “ उन्होंने कहा l तब उबलते पानी में जड़ी बूटियों को डाला गया l तुरंत गिलास से मधुर सुंगंध निकलने लगी – “ बिरले लोग ही जीवन की चुनौतियों में निखरकर बाहर आते है – ऐसे बनो !” निष्कर्ष देते हुए उन्होंने कहl l

कई बार हम चुनौतियों से अभिभूत हो जाते है l हम भावुकता में बहने लगते है तब समस्यों से थक और पक जाते है और हमारी निराशा स्पष्ट दिखने लगती है l कभी कभी हम स्वयं को कृत्रिम तौर पर इतना कठोर बना लेते है की हम दूसरो की भावनाओ अथवा विचारो के प्रति निर्जीव बन जाते है l हम निष्क्रिय और लापरवाह हो जाते है l परन्तु चुनौतियों को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है की हम अपने गुस्से को दबाये रखे और मज़बूरी मानकर जीवन जिये l इस प्रकार का बाहरी रूप से शांत जीवन का दिखावा हमारे आतंरिक संघर्षों को नहीं रोक पायेगा l

पेट में अन्पाचा भोजन शारीर को पोस्ता नहीं है अपितु कष्ट ही देता है l इसी प्रकार यदि हम जीवन की चुनौतियों को आतंरिक रूप से हजम नहीं कर पाएंगे , तो वे भावनाए जिन्हें हम आज अज़र अंदाज़ कर रहे है भविष्य में हमें ग्रस्त करती रहेगी l अच्छा हाजमा है – वास्तविक सहनशीलता l जीवन की घटनाओ को स्वीकार करिए , अध्यात्मिक दृष्टि से उनको आत्मसात करिए (पचाइये), उनसे कुछ शिक्ष लीजिये , कर्म के सिध्धांत को समझिये और आध्यात्मिकता कृष्ण भावनामृत की ओर रुख लीजिये l जीवन की समस्याए इसी चारित्रिक विकास के निमित्त ही है l

जगदगुरु श्रीला प्रभुपाद की जय  

हरे कृष्ण हरे कृष्ण

कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हरे राम हरे राम

राम राम हरे हरे

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