वह कौनसा लक्षण है जिससे हम बता सकते है की व्यक्ति ने भक्ति  में पूर्णता प्राप्त कर ली है ? भगवद गीता में कृष्ण कहते है की व्यक्ति योग में तभी स्थित होता है जब उसकी इच्छाए पूरी तरह से उसके वश में हो l (भगवद गीता ६.१८ ) जिसने योग में पूर्णता प्राप्त कर ली है वह वह अपने मन का गुलाम् नहीं होता बल्कि मन को अपने नियंत्रण में रखता है l मन को नियंत्रित करने के लिए न तो मन को मlरना पड़ता है न ही उसे शून्य पर ध्यान लगाने के लिए train करना पड़ता है वास्तविक योगी वह है जो हरदम कृष्ण का चिंतन करता हो l

यह पढ़ कर आपको लग रहा होगा की एसा कैसे संभव है की कोई हर पल कृष्ण का ध्यान कर सके क्या उसे जीवन निर्वाह के लिए कर्तव्य कर्म नहीं करने पड़ेंगे ? क्या परिवार की देख भाल नहीं करनी पड़ेगी ? करनी पड़ेगी और आप करेंगे भी पर इसे कृष्ण के चिंतन के साथ-साथ करना संभव है जब आप खुद को अपने घर का मालिक मानना बंद कर देंगे और कृष्ण को अपने घर का मालिक मानने लगेंगे(जो की वास्तव में है भी ) तब आप जो भी कार्य करेंगे उनमे कृष्ण शामिल अपने आप हो जायेंगेl अपने घर को कृष्ण का घर मानिये अपने को कृष्ण के घर का सेवक समझिये l आपको हमेशा यह याद रखना है की कृष्ण हम सब के स्वामी है और हम उनके सेवक है मेरे बच्चे,पत्नी सब कृष्ण की सेवा के लिए है l इस प्रकार घर के लिए काम तो करना है पर घर के प्रति जो हम में स्वामित्व का भाव है, अहंकार है तथा उनसे(परिवार के सदस्यों से ) सेवा पाने की जो भूक है उसे त्यागना होगा l अगर राजा के महल पर हमला हो तो सब से पहले कौन रक्षा के लिए भागेगा ? उत्तर है – महल का दरबान ; ऐसे ही यदि हमारे घर रूपी महल पर कोई संकट आएगा तो रक्षा के लिए आगे भी हम ही आयेंगे क्यों की हम कृष्ण रूपी रlजा के दरबान रूपी सेवक जो हैl जब हम अपने घर , व्यवसाय आदि के प्रति स्वामित्व का त्याग कर देते है तो भगवान का चिंतन मनन सतत(२४ घंटे) अपने आप होता ही है l हम खुद को नियंता मानते है इसी लिए हम कृष्ण का निरंतर चिंतन नही कर सकते केवल यही एक बाधा है यदि हम यह भाव त्याग दे तो सभी कर्मो को करते हुए भी आप कृष्ण का २४ घंटे मनन चिंतन कर सकते हैl यह अवस्था समधि कहलाती है l और जो इस अवस्था को साध ले वह योगारूढ़ कहलाता है l

जो योगारूढ़ है उसका उसकी इच्छाओ पर पूर्ण नियंत्रण होता है किन्तु इस अवस्था में भी इच्छा शून्य हो जाना संभव नहीं है इसलिए शुद्धि की विधि से इन्द्रिय तृप्ति की इच्छा को स्थानांतरित करना चाहिए l इच्छाओ को मरना संभव नहीं है क्यों की यह इच्छा जीव की चिर संगिनी है इसलिए खुद की इन्द्रिय तृप्ति के लिए इच्छा करने के बजाय कृष्ण की सेवा के लिए आप इच्छा कर सकते है lमसलन अगर आपकी इच्छा है सुस्वादु भोजन करने की तो इस क्रिया में कृष्ण को कैसे शामिल करे ? किया में बदलाव नहीं होता बल्कि निज इन्द्रियों हेतु क्रिया की भावना से कृष्ण हेतु क्रिया की भावना में स्थानांतरण होता है l हमें पहले कृष्ण के लिए प्रसाद बनाकर उन्हें यह कहते हुए भोग अर्पण करना चाहिए – “ यह भौतिक शरीरी अविद्या का पिंड है तथा इन्द्रिय मृत्यु तक ले जाने वाले मार्गो का जाल है l समस्त इन्द्रियों में जिव्हा अति लोलुप तथा दुरमति है l इसको जीतना इस संसार में बहुत कठिन है, इसलिए श्री कृष्ण ने जीभ पर विजय पाने हेतु यह उत्तम प्रसाद दिया हैl तो इस प्रसाद को पूरी संतुष्टि से लिया जाये और श्री श्री राधा कृष्ण का गुण गया जाये और प्रेम से भगवान चैतन्य और नित्यानंद प्रभु की मदद के लिए पुकार लगाईं जाये l “ इस प्रकार हमारा कर्म यज्ञ में बदल जाता है क्यों की हम प्रारंभ से ही सोचते है की यह भोजन कृष्ण को अर्पित हो रहा है l तब हम भोजन की इच्छा न भी करे परन्तु कृष्ण इतने दयालु है की वे हमें खाने को प्रसाद देते है l इस पकार हमारी इच्छा अपने आप पूर्ण हो जाती है l

जब कोई अपने जीवन को इस प्रकार ढाल लेता है तो उसकी इछाये कृष्ण की इच्छाओ के अनुकूल बन जाती है , तो यह समझना चाहिए की उसने योग की पूर्णता प्राप्त कर ली है l

श्रील प्रभुपद की जय ……………………..…….. हरे कृष्ण l

 

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*