जब हनुमान जी रामेश्वरम से श्री लंका तक सेतु निर्माण कर रहे थे तो वे बड़े बड़े पहाड़ उखाड़ उखाड़ कर समुद्र में ला ला कर उन्हें तैरने के लिए छोड़ रहे थे तब उनके मार्ग में बार बार एक गिलहरी आ रही थी जो छोटे छोटे ककड़ पत्थर बिन बिन कर समुद्र में डाल रही थी l तब हनुमान जी ने छोटी गिलहरी से कहा – “चलो भागो यहाँ से , तुम बार बार मेरे रस्ते में आ जाती हो मेरा रास्ता छोड़ दो अभी बहुत सारा काम बाकि है “ यह देख्कार प्रभु श्री राम ने हनुमान जी को डाटा- “ यह छोटी गिलहरी मेरे लिए जो कुछ भी कर सकती है कर रही है मै तुम्हारे बड़े बड़े पथ्थरो और इस गिलहरी के छोटे छोटे पथ्थरो को पानी में गिराने की सेवा में कोई अंतर नहीं देखता l मेरी नजार में तुम दोनों ही सामान हो l “

तो आप समझ सकते है की भगवान यह नहीं देखते की हम उनके लिए क्या कर रहे है वे यह देखते है की हम उनके लिए किस इरादे से , किस उद्देश्य से कर रहे हैl अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार गिलहरी और हनुमान जी दोनों की सेवा पूर्ण है किसी की सेवा छोटी या बड़ी नहीं हैl अध्यात्मिक जीवन और भौतिक जीवन में यही अंतर हैl अध्यात्मिक जीवन में उच्च या निम्न का मतलब यह नहीं है की आप किस हद तक या कितना ज्यादा सेवा कर पा रहे है बल्कि उच्च या निम्न आधारित है हमारे उद्देश्यों की शुद्धता पर, हमारे प्रेम और सहानुभूति की भावना परl और यही सब कृष्ण देखते है वे हमारी सेवा की भव्यता या निम्नता को अधिक महत्त्व नहीं देते है वे हमारे सेवा के पीछे हमारे जो भाव है उनको अधिक महत्त्व देते है l

इसलिए भक्ति का मार्ग हर किसी के लिए सदैव खुला है इसके लिए किसी भौतिक योग्यता की आवश्यकता नहीं हैl हम सभी चाहे जैसे भी हो पूर्ण रूप से योग्य है की हम कृष्ण के प्रेम को अनुभव कर पाए और अपने सामर्थ्य के अनुसार जो कुछ भी हम कर सकते हो उसे करके कृष्ण के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करे l

धर्म ग्रंथो में लिखा गया है की कृष्ण “भाव ग्राही “ है अर्थात कृष्ण यह नहीं देखते की आप उन्हें क्या अर्पण कर रहे है वे यह देखते है की आप किस भाव से, किस उद्देश्य से, कितने प्रेम से उन्हें अर्पण कर रहे है और हम में से हर कोई चाहे जो भी जैसा भी हो अपनी इच्छा शक्ति को कृष्ण की सेवा के लिए इस्तेमाल कर सकता हैl हमारे पास चाहे कुछ न भी हो पर तब भी हम कृष्ण को एक भव्य मंदिर भेट कर सकते हैl कृष्ण के लिए भव्य मंदिर बनाने के लिए हमारा धनवान होना जरुरी नहीं है बल्कि हमें मन से धनी बन्ने की जरुरत हैl यदि आप भक्तो की सहायता करना चाहते है तो यदि आपके पास मदद के लिए कुछ न भी हो तब भी यदि आपका उदेश्य उनकी सहायता करना है तो काम अपने आप बन जायेगा l यदि आप अपनी सामर्थ्यानुसार सेवा में रत है तो आपकी सेवा कृष्ण की नजरो में पूर्ण है l

श्रील प्रभुपाद की जय ……………………..… हरे कृष्ण

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